चाँद का कुरता रामधारी सिंह “दिनकर”

चाँद का कुरता रामधारी सिंह “दिनकर”
By: No Source Posted On: January 17, 2019 View: 633

चाँद का कुरता रामधारी सिंह “दिनकर”

चाँद का कुरता रामधारी सिंह “दिनकर”

हठ कर बैठा चाँद एक दिन ,

माता से यह बोला ,

सिलवा दो माँ, मुझे ऊन का,

मोटा एक झिंगोला |

सन-सन चलती हवा रात भर,

जाड़े से मरता हूँ,

ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह,

यात्रा पुरी करता हूँ,

 आसमान का सफ़र और यह,

मौसम है जाड़े का,

न हो अगर न हो अगर तो ला दो कुरता

ही कोई भाड़े का |

 बच्चे कि सुन बात कहा

माता ने अरे सलोने !

कुशल करे भगवान, लगे मत

तुझको जादू टोने|

 जाड़े की तो बात ठीक है ,

पर मै तो डरती हूँ ,

एक नाप में कभी नही

तुझको देखा करती हूँ |

 

कभी एक अंगुल भर चौड़ा,

कभी एक फूट मोटा ,

बड़ा किसी दिन हो जाता है

और किसी दिन छोटा |

घटता-बढाता रोज किसी दिन

                                                   रामधारी सिंह “दिनकर”

Tags:
# रामधारी सिंह “दिनकर” रामधारी सिंह “दिनकर” चाँद का कुरता  

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